तपती गर्मी, बचपन की यादें और एक कालजयी कविता - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शुक्रवार, 22 मई 2026

तपती गर्मी, बचपन की यादें और एक कालजयी कविता


आज जब घर से बाहर कदम रखते ही सूरज की तपिश और लू के थपेड़े बदन को झुलसाने लगते हैं, तो अचानक मन बचपन के उन दिनों में लौट जाता है, जब हम किताबों में "हवा और सूरज" की बहस की कहानी पढ़ा करते थे। बचपन में तो हमने इसे सिर्फ एक कहानी या कविता के रूप में पढ़ा और रटा था, लेकिन आज की इस हाहाकार मचाती गर्मी को देखकर समझ आता है कि कवि की कल्पना कितनी सटीक और जीवंत थी।
यह कविता केवल एक लोककथा नहीं, बल्कि प्रकृति के दो सबसे शक्तिशाली तत्वों के अहंकार और उनके प्रभाव का एक सुंदर चित्रण है। आज जब पारा आसमान छू रहा है, हवाएं थम सी गई हैं और तृण-तृण (तिनका-तिनका) तप रहा है, तब हिंदी साहित्य के पुरोधा आदरणीय द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी की यह कविता अनायास ही याद आ जाती है।
"कहीं किसी भी तरू का पत्ता कोई एक न हिलता,
आग बरसती थी मानो तृण तृण कण कण था जलता।"

इंटरनेट की इस अथाह दुनिया में कई बार हमारी प्रिय पुरानी रचनाएं भी खो जाती हैं, लेकिन बहुत खोजने के बाद मुझे यह अनमोल कविता मिल ही गई, और इस भीषण गर्मी के मौसम में मुझे इससे बेहतर और प्रासंगिक कुछ नहीं लगा। मैं इसे आज यहाँ आप सभी के साथ साझा कर रही हूँ, ताकि हमारी पीढ़ी की यादें ताज़ा हों और नई पीढ़ी भी इस खूबसूरत और सीख देने वाली रचना से रूबरू हो सके।
आइए, मिलकर पढ़ते हैं बचपन की वो याद, जो आज के मौसम की हकीकत बयां कर रही है...

हवा और सूरज

एक बार की बात बहस छिड़ गयी हवा सूरज में,
कौन अधिक बलवान शक्तिशाली है हममें तुममें ।
बहुत देर तक हुई बहस पर हो न सका कुछ निर्णय
दोनों ने आपस में मिल यह किया अन्त में निश्चय।
चलते राही के कपड़े जो सहज उतरवा लेगा
हम दोनों में वही अधिक बलवान शक्तिशाली होगा।
फिर क्या पवन चला सन सन पहले उसकी थी बारी
वस्त्र उड़ा कर ले जाने में लगा दी शक्ति सारी।
लेकिन ज्यों ज्यों वेग पवन का पल पल बढ़ता जाता
त्यों त्यों पथिक वस्त्र अपने कसता लपेटता जाता।
हारा पवन अन्त में सूरज ने गर्मी फैलाई
जलती तपती हुयी धूप से सब दुनिया अकुलाई।
कहीं किसी भी तरू का पत्ता कोई एक न हिलता
आग बरसती थी मानो तृण तृण कण कण था जलता।
तर हो गया पसीने से तन भीगे कपड़े सारे
घबरा गया पथिक झट उसने अपने वस्त्र उतारे ।

दूर फेंक उनको जा बैठा वह छाया पा तरु की
हुई बहस इस तरह खत्म तब हवा और सूरज की ।।

6 टिप्‍पणियां:

Bharti Das ने कहा…

बहुत सुंदर सामयिक आलेख

bbhhhe ने कहा…
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bbhhhe ने कहा…
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bbhhhe ने कहा…
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bbhhhe ने कहा…
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Alexendra ने कहा…

"A beautiful and nostalgic article. The vivid portrayal of the scorching summer and cherished childhood memories was truly heartwarming. The reference to a timeless poem added depth and charm to the piece. Reading it brought back many fond memories of my own childhood. Thank you for sharing such a thoughtful and engaging write-up."Find out more

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