माँ की छत्रछाया में - KAVITA RAWAT
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Sunday, May 8, 2022

माँ की छत्रछाया में

हमारा परिवार प्रकृति प्रेमी तो है ही साथ में पशु-पक्षी प्रेमी भी है। यह बात हमारे अड़ोसी-पड़ोसी ही नहीं बल्कि जान-पहचान और रिश्तेदार भी भलीभांति जानते हैं। हमारे इसी पशु-पक्षी प्रेम को देखते हुए कुछ दिन पहले हमारे एक परिचित अपने नए मकान में जाने से पहले अपने पालतू खरगोश का जोड़ा हमारे घर छोड़ गए। जिसमें एक सफ़ेद तो दूसरा काले रंग का था। सफ़ेद रंग के मादा को इल्लू और काले रंग के नर को हम टिल्लु कहकर पुकारते हैं। जब से वे घर में आये हैं उन्हें बच्चों जैसा पालना पड़ रहा हैं। माँ हूँ न, इसलिए उनका हरदम ख्याल रखे बिना मन को सुकून नहीं मिलता है। घर में गन्दगी न हो इसलिए हमने बगीचे में उनके लिए एक बड़ा से पिंजरा बनाया है। अब रसोई में मैं जो भी पकाती हूँ- दाल-चावल-खिचड़ी, रोटी-सब्जी, उसमें उनका भी एक हिस्सा करती हूँ। कोई भी सब्जी हो या फिर फल उसके छिलके उनके लिए निकालती हूँ, जिन्हें जब मैं बड़े चाव से खाते हुए देखती हूँ तो मन को बड़ा सुकून मिलता है। मेरे कहने पर पति और बेटा आस-पास से हरी घास, विशेष रूप से दूब और पेड़-पौधों की पत्तियाँ लाकर उन्हें जब-तब खिलाते रहते हैं। मैं जब भी उनके लिए कुछ खाना ले जाती हूँ तो वे झट से गेट पर आकर अपने दोनों पैरों पर खड़े हो जाते हैं, जिसे देख मुझे लगता है जैसे वे कह रहे हों कि 'माँ जल्दी खाना दो, भूख लगी है'। उन्हें देख मुझे मेरा बचपन याद आता है। हम सभी उन्हें दिन-भर कुछ न कुछ खिलाते-पिलाते रहते हैं और वे हैं कि खाने से अघाते नहीं, जिसे देख मैं सोचती हूँ कि इनका पेट है या इंडिया गेट। बच्चे भी उनकी इसी आदद के कारण उन्हें जन्मों-जनम के भुक्खड़ कहकर खिलाने -पिलाने में लगे रहते हैं। 

माँ हूँ न, इसलिए माँ की छत्रछाया में इल्लू,टिल्लू और उनका एक छोटा प्यारा बच्चा ढिल्लू मजे में हैं। जब मैं उन्हें पिंजरे से बाहर निकालती हूँ तो साथ-साथ बग़ीचे में एक-दूसरे के पीछे उछलते-कूदते और खाते-पीते रहते हैं। हमारे अलावा उन तीनों का ख्याल रखने के लिए हमारा एक प्यारा ' गुटुरु ' भी हैं। वह भले ही उनकी जात-बिरादरी का नहीं है, फिर भी वे उससे कोई द्वेष नहीं रखते हैं, मिल-जुलकर रहते हैं, जिसे देख मन को बड़ी ख़ुशी मिलती है कि चलो कहीं तो भेदभाव देखने को नहीं मिल रहा है। अब आप सोच रहे होंगे की इल्लू-टिल्लू की जात-बिरादरी से दूर वाला ये तीसरा कौन है? यह है हमारा- 'गुटुरु'  यानि कबूतर। यहीं उनका साथी है। इसकी भी एक अपनी अलग कहानी सुनते चलिए। कुछ दिन पहले जब वह बहुत छोटा था तो अपने माँ-बाप से बिछुड़कर वह पड़ोसियों के बगीचे में गिर पड़ा था, जिसका शिकार करने लिए कुछ कुत्ते उसके पीछे पड़ गए तो उन्होंने उसे बचाकर हमें सौंप दिया था। क्योँकि छोटे से कबूतर के बच्चे को कैसे खिलाना-पिलाना है, वे नहीं जानते थे।  यदपि कबूतर के बच्चे को खिला-पिलाकर बड़ा करना हमारे लिए भी सरल काम नहीं था, फिर भी हमने इस चुनौती को स्वीकारा। इसके लिए हमने चने की दाल-चावल को भिगोया और फिर मिक्सर में पीसकर सिरिंज में डालकर उसे खिलाया-पिलाया। दो-तीन दिन बाद जब हमने देखा कि वह धीरे-धीरे खुद खाने लगा तो हम आश्वस्त हो गए कि चलो अब कोई दिक्कत वाली बात नहीं है तो हमने उसे इल्लू-टिल्लू के हवाले कर दिया। गुटुरु को हम भाग्यशाली मानते हैं क्योंकि उसके पहले २ घायल कबूतर के बच्चों को हम लाख कोशिश करने के बाद भी बचा नहीं पाए थे। जिसमें एक की गर्दन पतंग का माँजा फ़ँसने से टूटी हुई थी और दूसरे के पंजों में इधर-उधर लापरवाही से फेंकने वाले इंसानों के सिर के बाल लिपटे पड़े थे, जिसके कारण शायद वह उड़ नहीं पाया होगा और इधर-उधर गिर-पड़  कर उसे कहीं गहरी अंदरूनी चोट लगी रही होगी। इंसानी नादानी और लापरवाही इन बेजुवान पशु-पंछियों पर कितना भारी पड़ता है, यह अक्ल कुछ लोगों में जाने कब आएगी? अपने आँखों के सामने ऐसे बेजुवान पंछियों को मरता देख मन को बड़ा दुःख पहुँचता हैं। लेकिन इस बात की संतुष्टि जरूर मिलती कि कम से कम हम उन्हें बचाने की अपनी तरफ से पूरी कोशिश तो करते हैं।   

आजकल हमारा गुटुरु भी बड़ा हो गया है और समझदार भी। वह सुबह-सुबह गुटुरु गुं, गुटुरु गुं कर पिंजरे से बाहर उड़ने के लिए हमें आवाज लगाता है और जब हम पिंजरे का दरवाजा खोल उसे छोड़ते हैं तो वह आस-पास की बिल्डिंग, पेड़ों में बैठकर मटर गस्ती करता मिलता है। उसे जब भी मटर गस्ती कर भूख सताने लगती है तो वह फ़ौरन कभी बगीचे में लगे नीम के पेड़ तो कभी हमारी खिड़की में आकर 'गुटुरु गुं-गुटुरु गुं'  की रट लगता है। उसकी इस रट की भाषा को हम बखूबी समझने लगे हैं इसलिए उसके लिए छज्जे पर जैसे ही उसका खाना-पानी रखते हैं वह फुर्र से आकर उसपर अपना हक़ जमाकर बैठ जाता है। वह दिन भर आवारा बनकर घूमता-फिरता है और शाम को जैसे ही हम उसे 'गुटुरु-गुटुरु' बोलकर आवाज लगाते हैं वह जहाँ ही होगा वहीँ से पहले दो-चार बार 'गुटुरु गुं-गुटुरु गुं' करेगा और फिर फुर्र से उड़ते पिंजरे के गेट के आगे बैठकर उसके अंदर जाने के लिए उसके चक्कर काटने लगेगा और फिर जैसे हम पिंजरे का गेट खोलते हैं वह फ़ौरन जाकर इल्लू, टिल्लू के पास बैठ जाता है।  उन तीनों को आराम से एक साथ मिल-जुलकर रहते देख मुझे बड़ी ख़ुशी मिलती हैं। 

..कविता रावत   

9 comments:

Sweta sinha said...

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना रविवार ८ मई २०२२ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

विश्वमोहन said...

वाह! बहुत सुंदर!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इल्लु , टिल्लू, गुटरू पक्षी हैं इसलिए प्रेम से रहते हैं ।
रोचक वर्णन

नूपुरं noopuram said...

वाह! अनोखा परिवार! अनोखी रचना!

Sudha Devrani said...

वाह!!!
बहुत ही सुन्दर परिवार बनाया है आपने...आसान भी कहाँ होता है इन्हें पालना...
सचमुच माँ हैं आप इनकी भी।
बहुत सुंदर लेख।

Vocal Baba said...

वाह..बहुत ही रोचक। ये पक्षी भी अपने-आपको भाग्यवान समझते होंगे कि चलो दाना-पानी के इंतजाम के झंझट से छुटकारा मिला।

Meena Bhardwaj said...

आपके ख़रगोशों और कबूतर का परिवार बहुत अच्छा लगा । स्नेह की भाषा पशु-पक्षी भी खूब अच्छी तरह से महसूस करते हैं ।

डॉ. जेन्नी शबनम said...

इल्लू, टिल्लु, ढिल्लु, गुटरु की तरह ढेरों पशु पक्षियों की आप माँ बनें। मूक पशु पक्षी हमारे प्यार के भूखे हैं और खाना के भी। यूँ ही पशु पक्षियों को जीवन दान देती रहें, हार्दिक शुभकामनाएँ।

Jyoti Dehliwal said...

कविता दी, पशु पक्षियों में भी अपना एक अलग ही प्रेम भाव होता है।बीजो शायद आज इंसानों में कम देखने मिल रहा है। जब पशु पक्षी हमारे द्वारा दिया हुआ खाना खाते है तो वक अलग ही प्रकार की खुशी का एहसास होता है।
एक ममतामई मां ऐरफ इंसानों की ही नहीं होती। तो वक माँ को पशु पक्षी भी अपने बच्चों समानन्हि लगते है।
बहुत सुंदर रचना।