मैं और मेरा स्वार्थ: आधुनिक समाज का कड़वा सच - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

मैं और मेरा स्वार्थ: आधुनिक समाज का कड़वा सच



मग्न रहो निज के ही रस में,
परवाह न करो जग की हलचल की।
ज्वाला धधके या प्रलय मचे,
जीना है तो बस स्वार्थ-बल पर जी।

जपो निरंतर "मेरा-मेरा" का जाप,
उसी में सिमट, उसी में ढल जाओ।
परमार्थ का विचार तनिक न करना,
पर "त्यागी" का आवरण ओढ़े जाओ।

सुनो न आर्तनाद, देखो न पीर,
मूक-बधिर सा स्वांग रचो।
तटस्थ रहो हर कोलाहल से,
पत्थर पर खिंची लकीर बनो।

नियति के चक्र को निर्बाध रहने दो,
सपनों को आँखों में सो जाने दो।
समय की कठिन कश्मकश के बीच,
एक खामोश, मरणशील तस्वीर बनो।
... कविता रावत 

1 टिप्पणी:

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

सच ही कहा आपने कविता जी

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