
स्वागत करती सांस्कृतिक छटा
कड़ाके की ठंड के बावजूद बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। स्कूल प्रांगण में प्रवेश करते ही रंग-बिरंगी छतरियों से सजी इमारत ने मन मोह लिया। मुख्य द्वार पर फूलों से निर्मित 'भारत माता का मानचित्र' और उसके चारों ओर टिमटिमाते दीपक हमारी सनातन सांस्कृतिक एकता का जयघोष कर रहे थे। उन्हें देखकर सहसा इकबाल की पंक्तियाँ याद आ गईं— “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।” जहाँ विश्व की कई प्राचीन सभ्यताएँ समय के थपेड़ों में विलुप्त हो गईं, वहीं हमारी संस्कृति आज भी अपने गौरवशाली स्वरूप में जीवंत है।

त्रि-आयामी प्रदर्शनी: सृजन के विभिन्न सोपान
प्रदर्शनी को तीन मुख्य विभागों में बांटा गया था, जहाँ लगभग 2000 से अधिक मॉडल्स बच्चों की ऊर्जा और रचनात्मकता की कहानी कह रहे थे:
के.जी. विंग (नन्हे कदम): नन्हें हाथों से बने मिट्टी के बर्तन और खिलौने उनकी मासूमियत को दर्शा रहे थे। फैशन परेड और नृत्यों में उनकी भोली अदाओं ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
प्राइमरी विंग (सीखने की उमंग):
पहली कक्षा के 'अतुल्य भारत' ने देशभक्ति का संचार किया, तो दूसरी कक्षा के छात्रों ने 'सर्विस मॉडल्स' (पायलट, शेफ, एयर होस्टेस) के माध्यम से भविष्य के सपनों को पंख दिए।
कक्षा चौथी-पांचवीं के छात्रों ने स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाते हुए बड़े ही रोचक स्लोगन दिए, जैसे— “पेट के दुश्मन हैं तीन: पिज्जा, बर्गर और चाउमीन” और “रहना है अगर डॉक्टर से दूर, फल-सब्जी खाओ हुजूर।”
छठी से नौवीं तक के छात्रों ने सांस्कृतिक विविधता और आधुनिक तकनीक (जैसे स्पाई कार) का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। वहीं, संस्कृत विभाग ने ऋषि-मुनियों, आयुर्वेद और प्राचीन ज्ञान-विज्ञान को जीवंत कर दिया।


सेकेंडरी विंग (बौद्धिक विस्तार):
गणित और वाणिज्य: क्रिप्टोग्राफी, वैदिक गणित और बैंकिंग सिस्टम से लेकर विदेशी निवेश (FDI) तक के जटिल विषयों को छात्रों ने मॉडल्स के जरिए सरलता से समझाया।
विज्ञान: विंडमिल, ह्यूमन जनरेटर, रोबोटिक कार और केपलर स्पेस टेलीस्कोप जैसे प्रयोगों ने आधुनिक विज्ञान की खिड़कियाँ खोल दीं।
कला और शिल्प का आकर्षण
प्रदर्शनी का एक कोना हस्तशिल्प को समर्पित था। नेपकिन होल्डर, वॉल हैंगिंग, बर्ड हाउस और टिश्यू पेपर से बने आकर्षक गुलदस्ते बच्चों की सूक्ष्म कलात्मक दृष्टि का प्रमाण दे रहे थे।

एक सार्थक निवेश
पाँच घंटे का समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला। प्रदर्शनी के अंत में थके हुए बच्चों के चेहरों पर तब मुस्कान लौटी, जब उन्होंने बाहर लगे स्टॉल्स पर अपने पसंदीदा व्यंजनों का आनंद लिया।
निष्कर्ष:बच्चों के उत्सवों में उनके साथ 'बच्चा' बनकर शामिल होना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उनके भीतर जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का एक जरिया है। हमारी व्यस्त जिंदगी का यह छोटा सा समय, उनके भविष्य के लिए एक 'बड़ा निवेश' है। यह अहसास हमें अपनी जड़ों और अपने बच्चों के सपनों से जोड़ता है।


.... कविता रावत

त्रि-आयामी प्रदर्शनी: सृजन के विभिन्न सोपान
प्रदर्शनी को तीन मुख्य विभागों में बांटा गया था, जहाँ लगभग 2000 से अधिक मॉडल्स बच्चों की ऊर्जा और रचनात्मकता की कहानी कह रहे थे:
के.जी. विंग (नन्हे कदम): नन्हें हाथों से बने मिट्टी के बर्तन और खिलौने उनकी मासूमियत को दर्शा रहे थे। फैशन परेड और नृत्यों में उनकी भोली अदाओं ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
प्राइमरी विंग (सीखने की उमंग):
पहली कक्षा के 'अतुल्य भारत' ने देशभक्ति का संचार किया, तो दूसरी कक्षा के छात्रों ने 'सर्विस मॉडल्स' (पायलट, शेफ, एयर होस्टेस) के माध्यम से भविष्य के सपनों को पंख दिए।
कक्षा चौथी-पांचवीं के छात्रों ने स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाते हुए बड़े ही रोचक स्लोगन दिए, जैसे— “पेट के दुश्मन हैं तीन: पिज्जा, बर्गर और चाउमीन” और “रहना है अगर डॉक्टर से दूर, फल-सब्जी खाओ हुजूर।”
छठी से नौवीं तक के छात्रों ने सांस्कृतिक विविधता और आधुनिक तकनीक (जैसे स्पाई कार) का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। वहीं, संस्कृत विभाग ने ऋषि-मुनियों, आयुर्वेद और प्राचीन ज्ञान-विज्ञान को जीवंत कर दिया।


सेकेंडरी विंग (बौद्धिक विस्तार):
गणित और वाणिज्य: क्रिप्टोग्राफी, वैदिक गणित और बैंकिंग सिस्टम से लेकर विदेशी निवेश (FDI) तक के जटिल विषयों को छात्रों ने मॉडल्स के जरिए सरलता से समझाया।
विज्ञान: विंडमिल, ह्यूमन जनरेटर, रोबोटिक कार और केपलर स्पेस टेलीस्कोप जैसे प्रयोगों ने आधुनिक विज्ञान की खिड़कियाँ खोल दीं।
कला और शिल्प का आकर्षण
प्रदर्शनी का एक कोना हस्तशिल्प को समर्पित था। नेपकिन होल्डर, वॉल हैंगिंग, बर्ड हाउस और टिश्यू पेपर से बने आकर्षक गुलदस्ते बच्चों की सूक्ष्म कलात्मक दृष्टि का प्रमाण दे रहे थे।

एक सार्थक निवेश
पाँच घंटे का समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला। प्रदर्शनी के अंत में थके हुए बच्चों के चेहरों पर तब मुस्कान लौटी, जब उन्होंने बाहर लगे स्टॉल्स पर अपने पसंदीदा व्यंजनों का आनंद लिया।
निष्कर्ष:बच्चों के उत्सवों में उनके साथ 'बच्चा' बनकर शामिल होना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उनके भीतर जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का एक जरिया है। हमारी व्यस्त जिंदगी का यह छोटा सा समय, उनके भविष्य के लिए एक 'बड़ा निवेश' है। यह अहसास हमें अपनी जड़ों और अपने बच्चों के सपनों से जोड़ता है।


.... कविता रावत


30 टिप्पणियां:
सुंदर प्रस्तुति...
नियमित विद्यालयचर्या से विलग रोचक क्रियाशीलता।
आदरणीय बहुत ही सुंदर प्रस्तुति के साथ , बच्चों के संग बातें शेयर की हैं आपने , धन्यवाद
बीता प्रकाशन -: घरेलू उपचार ( नुस्खे ) भाग - ६
नया प्रकाशन -: कंप्यूटर है ! - तो ये मालूम ही होगा -भाग - १
बहुत अच्छा लगा ये एग्जिबिशन के चित्र देखकर ...... :)
बहुत सुंदर
प्रोजेक्ट प्रदर्शनी बहुत सुन्दर है !
नई पोस्ट चाँदनी रात
नई पोस्ट मेरे सपनों का रामराज्य ( भाग २ )
बच्चों की रंगबिरंगी झाकियां बचपन के दिनों को ताज़ा कर रही हैं ... भारत माता के चित्र तो बहुत ही आकर्षित हैं ... शुभकामनाएं हैं मेरी बच्चों को ...
क्या बात वाह! बहुत ख़ूब!
अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?
बच्चों की क्रिएटिविटी की बहुत सुन्दर-सुन्दर झलकियां ........
देखकर मन आनंदित हो उठा !!!!
प्रोजेक्ट प्रदर्शनी का इतना सुन्दर रोचक प्रदर्शन देखकर हम भी स्कूल के रंग में खो गए थे कुछ देर के लिए .....बहुत ख़ूब!!
कार्यक्रम की बहुत ही अच्छी झलक।
सादर
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (25-12-13) को "सेंटा क्लॉज है लगता प्यारा" (चर्चा मंच : अंक-1472) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सुन्दर झलकियाँ।।
:-)
चित्रों के साथ सुंदर प्रस्तुति...!
==================
RECENT POST -: हम पंछी थे एक डाल के.
bahut rochak lekh .. mujhe bharat ka map wala photo bahut sundar laga .
MAN PRAFULLIT HO GAYA KAVITA JI .BAHUT SUNDAR CHITRMAYI PRASTUTI .
सुंदर झांकियां .... मनमोहक
आजकल विद्यालयों में रचनात्मकता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
वाह !वाह ! सुन्दर झांकियां। सुन्दर सर्व -समावेशी प्रदर्शनी
फिर जैसे ही स्कूल के बाहरी द्वारा से स्कूल प्रांगण में दाखिल हुए तो सुन्दर बहुरंगी छोटी-छोटी छतरियों से सजी स्कूल बिल्डिंग देखकर मन खुशी से प्रफुल्लित हो उठा। मुख्य द्वारा से प्रवेश करते ही भारत माता का फूलों से सजाया मानचित्र जिसके चारों ओर छोटे-छोटे प्रज्ज्वलित जगमगाते दीपक हमारी सृष्टि के आदि से चली आ रही गरिमामयी सांस्कृतिक एकता की विशेषता का बखान करते दिखे तो मन रोशन हो उठा। सोचने लगी इसी विशेषता के चलते हमारी संस्कृति विश्व प्रांगण में उन्नत मस्तक किए हैं। रोम हो या मिश्र या बेवीलोनिया या फिर यूनान की संस्कृतियाँ, ये सभी काल के कराल थपेड़ों से नष्ट हो गईं, लेकिन हमारी संस्कृति काल के अनेक थेपेड़े खाकर भी आज भी अपने आदि स्वरूप में जीवित है। इस संबंध में इकबाल की पंक्तियाँ याद आयी कि- “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।"
यूनान मिश्र रोमा सब मिट गए जहां से ,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
कल 26/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!
ऐसा ही सुखद आभास मुझे तब हुआ जब मैं अभी हाल ही में आयोजित बच्चों के सेंट जोसफ को-एड स्कूल में आयोजित विज्ञान और क्राफ्ट प्रदर्शनी देखने पहुँची।
पहले तो सुबह सुबह-सुबह ठंड के बावजूद बच्चों के उत्साह को देखकर सारी ठंड जाती रही फिर जैसे ही स्कूल के बाहरी द्वारा से स्कूल प्रांगण में दाखिल हुए तो सुन्दर बहुरंगी छोटी-छोटी छतरियों से सजी स्कूल बिल्डिंग देखकर मन खुशी से प्रफुल्लित हो उठा।
......... जब बच्चों की बात आती हैं तो फिर सब ठण्ड वंड कहाँ लगती है ................ उनका काम पहले करना ही पड़ता है ..नहीं तो नाराज हुए तो खैर नहीं अपनी ...
.........बहुत-बहुत-.बहुत सुन्दर ..
हैप्पी क्रिसमस
सुंदर विवरण
तभी तो बच्चों को भविष्य का निर्माता कहा जाता है.. भगवान करे ये सारे रंग उनके जीवन में भर जायें और ये सभी अपने सुन्दर भविष्य के बेहतर मॉडेल बनायें!!
अच्छी व्यंग्यात्मक प्रस्तुति है !
पेट के दुश्मन हैं तीन
पिज्जा, बर्गर और चाउमिन’
अरे ये तो आजकल के बच्चों का फेब्रेट है
मेरा तो फ़ोटो देखकर खाने का बहुत मन कर रहा है ...
अच्छा संदेश दिया है ...
बहुत बढिया...सुन्दर प्रस्तुति है !
कविता बहन शुक्रिया आपकी टिपण्णी का। बहुत स्तरीय रिपोर्ताज़ प्रस्तुत किया है आपने।
बढिया...सुन्दर प्रस्तुति है !
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