वो वसंत की चितचोर डाली - KAVITA RAWAT
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Saturday, May 22, 2010

वो वसंत की चितचोर डाली

कुछ शर्माती कुछ सकुचाती
          आती बाहर जब वो नहाकर
मन ही मन कुछ कहती
          उलझे बालों को सुलझाकर

पट-पट-पट,झटक-झटककर
          बूंदें गिरतीं बालों से पल-पल
दिखतीं ये मोती सी मुझको
          या ज्यों झरता झरने का जल

तिरछी नजर घुमाती वो
         अधरों पर मदिर मुस्कान लिए
कभी एकटक निहारती
          पलकों को जैसे आराम दिए

हँसमुख चेहरा लुभाता उसका
          सूरत दिखती भली-भली
कभी लगती खिली फूल सी
          कभी दिखती कच्‍ची कली

महकता उपवन यौवन उसका
          नाजुक डली सुमधुर मिश्री
वो वसंत की चितचोर डाली
          मैं पतझड़ सी बिखरी बिखरी!

         .......कविता रावत

35 comments:

कडुवासच said...

...सुन्दर रचना!!!

Anonymous said...

bahut hi behtareen rachna.....
achha warnan....
yun hi likhte rahein..
regards...
meri nayi kavita bhi jaroor padhein...

Unknown said...

वाह !!....बसंत को बहुत ख़ूबसूरती और चंचलता के साथ आपने पेश किया है .........बहुत ही लाजवाब रचना .

M VERMA said...

पट-पट-पट,झटक-झटककर
बूंदें गिरतीं बालों से पल-पल
वाह बसंत का मानवीकरण आपने बहुत सुन्दरता से किया है
बहुत सुन्दर

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत रचना

संजय भास्‍कर said...

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

Amitraghat said...

...उम्दा.."

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

तिरछी नजर घुमाती वो
अधरों पर मदिर मुस्कान लिए
कभी एकटक निहारती
पलकों को जैसे आराम दिए
बहुत सुन्दर रचना कविता जी , एक बात और कहूंगा कि जिस पेड़ का चित्र आपने साथ में लगाया उस पर लगे फलों को देख मुह में पानी आ गया ! खटाई बहुत प्रिय डिश हुआ करती थी कभी सर्दियों की दोपहर की !

rashmi ravija said...

बहुत ही ख़ूबसूरत, रचना

राजेश उत्‍साही said...

कविता जी मन प्रसन्‍न हुआ। एक सुझाव है। अगर हर चार पंक्तियों के बीच आप एक एंटर स्‍पेश दे देंती तो रचना पढ़ने में और आनंद आता। क्‍योंकि कविता की चार-चार पंक्तियां अपने आप में संपूर्ण हैं। बधाई।

मुकेश कुमार सिन्हा said...

wo basant ki chitchor daali............:)

Kavita jee.......aapne to apne andar male figure ko feel karke badi pyari baat kah daali........hai na!!

Kash!! aise soch ham me bhi aata........:P

bahut khubsurat........bahut pyari
RACHNA!!

सम्वेदना के स्वर said...

कमाल है कविता जी...क्षमा चाहूँगा ..शुरूआती पंक्तियों को पढकर लगा जैसे किसी पुरुष के मुख से सद्यःस्नाता स्त्री का वर्णन है... बहुत खूब..

वन्दना अवस्थी दुबे said...

वो वसंत की चितचोर डाली
मैं पतझड़ सी बिखरी बिखरी!
बहुत सुन्दर प्रकृति-चित्रण. सुन्दर रचना

मनोज कुमार said...

उत्तम अभिव्यक्ति।

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

खूबसूरत शब्दों से संजोयी खूबसूरत रचना.... खूबसूरती से दिल को छू गई....

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर रचना, शुभकामनाएं.

रामराम.

वाणी गीत said...

वसंत का बहुत खूबसूरत वर्णन ...मगर वसंत में पतझड़ का क्या काम ...झूम लीजिये वसंत के संग में ...पतझड़ भी सावन हो जाएगा ...!!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

हँसमुख चेहरा लुभाता उसका
सूरत दिखती भली-भली
कभी लगती खिली फूल सी
कभी दिखती कच्‍ची कली

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ! बढ़िया रचना !

Anonymous said...

वो वसंत की चितचोर डाली
मैं पतझड़ सी बिखरी बिखरी!
क्यूँ खुद को भी ऐसा ही बना डालिए - सुंदर रचना के लिए बधाई

शोभना चौरे said...

bahut sundar kavita .

Ashish (Ashu) said...

वाह क्या रचना प्रस्तुत की आपने..सुंदर भावपूर्ण और लयबद्ध वाकी बहुत सुन्दर रचना है बसंत का सजीव वर्णन ..आभार

दिगम्बर नासवा said...

पट-पट-पट,झटक-झटककर
बूंदें गिरतीं बालों से पल-पल
दिखतीं ये मोती सी मुझको
या ज्यों झरता झरने का जल

Sundar bhaav .. lay liye .. basant ka jeeta jaagta varnan kiya hai aapne ... bahut madhur rachna ..

Urmi said...

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब रचना लिखा है जो प्रशंग्सनीय है!

हर्षिता said...

बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति।

रश्मि प्रभा... said...

kavi kee kalam basant kee daali kisi heer se kam nahin

शरद कोकास said...

गर्मी के मौसम मे बसंत की कविता पढ़कर अच्छा लगा

HBMedia said...

aapne mere blog gaurtalab par aakar mera hausla badhaya..Shukriya!
main jab aapki rachnaye padhata hoon to mujhe apni sachayi ka ehsas ho jaaa hai..jaise "sagar mein gagar"

Rajat Yadav said...

हाय गजबे हो आंटी !!

Anonymous said...

aur haan mere blog par...
तुम आओ तो चिराग रौशन हों.......
regards
http://i555.blogspot.com/

हरकीरत ' हीर' said...

कुछ शर्माती कुछ सकुचाती
आती बाहर जब वो नहाकर
मन ही मन कुछ कहती
उलझे बालों को सुलझाकर


वाह....!
छंदबद्ध सुंदर शब्द बंधन .....!!

रविंद्र "रवी" said...

लाजवाब पेशकश!
वाह वाह वाह !!!

विजय मधुर said...

sarachnayen sachmuch utkrist hain.

Unknown said...

AAP PRERNA KI DEVI HO PARNAAM

विजय मधुर said...

जन्हा एक ओर बाढ़ से लोग परेशान हैं
वन्ही बसंत के आगमन का मधुर सन्देश
मन को सुकून पंहुचाता है. |