अनुशासन का पहिया और सड़क का तमाशा: मेरा एक अनुभव - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शनिवार, 4 जनवरी 2025

अनुशासन का पहिया और सड़क का तमाशा: मेरा एक अनुभव


डिजिटल हाजिरी और समय की बंदिश : आज का दौर डिजिटल हो चला है। दफ्तरों में अब हाजिरी रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने वाला पुराना ढर्रा खत्म हो गया है। अब अंगूठा लगाने या चेहरा दिखाने वाली मशीनों (बायोमेट्रिक) ने हमें समय का पाबंद बना दिया है। जब से शनिवार की छुट्टी के बदले कार्यदिवसों का समय सुबह 10 से शाम 6 बजे हुआ है, तब से समय पर ऑफिस पहुँचने की चुनौती कभी-कभी किसी आफत से कम नहीं लगती।
सड़क पर एक आकस्मिक हादसा : एक सुबह, जब मैं जल्दी-जल्दी ऑफिस के लिए निकली, तभी घर से कुछ ही दूर मेन रोड पर एक अजीब वाकया हुआ। एक आदमी लड़खड़ाते हुए अचानक मेरी एक्टिवा से टकराया और फिर पीछे से आती एक बाइक की चपेट में आकर सड़क पर गिर पड़ा। मैंने जैसे-तैसे खुद को संभाला और किनारे रुककर गहरी साँस ली। जब मैंने उस आदमी को बेसुध पड़े देखा, तो मेरा कलेजा मुँह को आ गया।
भीड़ का रवैया और मेरी व्याकुलता : वहाँ लोगों का हुजूम जमा हो गया, लेकिन सबकी चिंता उस बाइक सवार लड़के के लिए थी। गनीमत रही कि उसने हेलमेट पहना था, इसलिए उसे गहरी चोट नहीं आई। वह तो लोगों को धन्यवाद बोलकर निकल गया, लेकिन वह अधेड़ व्यक्ति अब भी चित पड़ा था। मुझसे रहा नहीं गया, मैं घबराकर उसके पास दौड़ी। तभी भीड़ में से किसी ने कहा, "मैडम, आप खामख्वाह परेशान हो रही हैं, इसे कुछ नहीं हुआ है।"
मुझे हैरानी हुई। मैंने ज़ोर देकर कहा कि वह बेहोश है और उसे उठाना चाहिए। मेरे कहने पर जब लोगों ने उसे किनारे किया, तब मेरी जान में जान आई। मैंने उन्हें अस्पताल ले जाने की गुजारिश की, तो वे लोग हँसने लगे। उन्होंने बताया कि यह व्यक्ति एक नंबर का नशेड़ी है और इसका रोज का यही नाटक है; यहाँ तक कि इसके घरवाले भी इससे हार चुके हैं।
एक दार्शनिक अंत गम और गजल : मैं भारी मन और आशंकाओं से भरी हुई अपनी एक्टिवा की तरफ बढ़ी। मेरे मन में डर था कि कहीं सच में उसे कुछ हो न गया हो। लेकिन जैसे ही मैंने मुड़कर देखा, मैं दंग रह गई! वह आदमी झटके से उठा और लोगों को घूरते हुए बिल्कुल ग़ुलाम अली की उस मशहूर गजल की तर्ज पर झूमने लगा:
"हंगामा है क्यूँ बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है, 
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है..."
     उसका वह अंदाज देख मेरा सारा डर काफूर हो गया। मैं भी जगजीत सिंह की इस पंक्ति को गुनगुनाती हुई दफ्तर की ओर सरपट भाग चली:
"ये पीने वाले बहुत ही अजीब होते हैं, 
जहाँ से दूर ये खुद के करीब होते हैं।"
... कविता रावत

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