धिक्कार है उनकी ऐसी उदारता - KAVITA RAWAT
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Thursday, October 29, 2009

धिक्कार है उनकी ऐसी उदारता


मन को पहुँचा कर आघात
वे अक्सर पूछ लेते हैं हाल हमारा
'कैसे हो'
मृदुल कंठ से
दिल कचोट जाने वाली
कुटिल भावना के साथ
यकायक मन में मच जाती तीव्र हलचल
शांत मन में जैसे आ गया हो तूफां
अशांति का तांडव मच जाता
जैसे उफनती नदी का शोर कल-कल, छल-छल
शांत मन में कैसी ये उथल-पुथल!
बड़े ही उदार दिखते हैं ऐसे लोग
जो पहले दिल पर वार करते हैं
और फिर अपनापन जताकर
सबकुछ जानते हुए भी
अनजान बनाने का ढोंग कर
बड़ी बेशर्मी से
हाल चाल भी पूछ लेते हैं
धन्य है! उनकी यह धृष्टता
और धिक्कार है उनकी ऐसी उदारता!

Kavita Rawat

17 comments:

रश्मि प्रभा... said...

मन को पहुँचा कर आघात
वे अक्सर पूछ लेते हैं हाल हमारा
'कैसे हो'
मृदुल कंठ से
दिल कचोट जाने वाली
कुटिल भावना के साथ .........isi kutilta ko log apna raham samajhte hain

प्रकाश गोविंद said...

yahi chalan hai aaj ka.

katu satya ko udghatit karti maulik rachna
achha laga padhkar
aabhar

shubh kamnayen

Apanatva said...

aajkal ise hee vyavhar kushalata kee bhee sanghya dee jatee hai .

मनोज कुमार said...

निःसंदेह यह एक श्रेष्ठ रचना है।

नीरज गोस्वामी said...

बहुत अच्छी और सच्ची रचना...बधाई...आपको.
नीरज

रानी पात्रिक said...

सही कहा है आपने। मन की बात रख दी आपंने सुन्दरता के साथ

अजित गुप्ता का कोना said...

इस कुटिलता से ही दुनिया चल रही है। ऐसा लगने लगा है कि इसने इतनी तेजी से पैर पसारे हैं कि सब कुछ छोटा लगने लगा है। बधाई।

शरद कोकास said...

यह अच्छी कविता है लेकिन भाव के अलावा इसे थोड़ी मेहनत कर कविता केशिल्प मे ढालना होगा ताकि लय और प्रवाह दोनो आ जाये एसे एक बार सस्वर पढ़ो पता चल जायेगा कैसे करना है ।

Unknown said...

समाज के स्वार्थी और दो मुँहे चरित्रों को दिगंबर करती धारदार कविता,,,,,,,,,,

बारम्बार बधाई !

Anonymous said...

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Arshia Ali said...

कुछ लोग ऐसे ही होते हैं, बेहतर है किउनको इग्नोर किया जाए।
--------
स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक।
चार्वाक: जिसे धर्मराज के सामने पीट-पीट कर मार डाला गया।

शोभना चौरे said...

aaj isi ko pribhashit kar dya gya hai .

निर्मला कपिला said...

जो पहले दिल पर वार करते हैं
और फिर अपनापन जताकर
सबकुछ जानते हुए भी
अनजान बनाने का ढोंग कर
बड़ी बेशर्मी से
हाल चाल भी पूछ लेते हैं
धन्य है! उनकी यह ध्रष्टता
और धिकार है उनकी ऐसी उदारता
बिलकुल सही कहा है ये दुनिया सच मे ऐसी ही है बहुत अच्छी कविता है बधाई

राकेश कौशिक said...

कुटिलता पर करारी चोट. सच को दर्शाती बहुत बहुत सुंदर रचना. बधाई.

सूर्यकांत द्विवेदी said...

कविता जी
मेल के लिए आभार।
अंतरमन का गीत वही
जो तुम भी गाओ
हम भी गाएं
कुछ पीड़ा अधूरी है
तुम सुनो मगर
हम कह न पाएं
सूर्यकांत

संजय भास्‍कर said...

बेहतर ढ़ंग से आपने अपने मन की बात कही।

संजय भास्‍कर said...

सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं. आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.