रखना इनका पूरा ध्यान - KAVITA RAWAT
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Thursday, January 28, 2010

रखना इनका पूरा ध्यान



बीडी-सिगरेट, दारू, गुटका-पान
आज इससे बढ़ता मान-सम्मान
दाल-रोटी की चिंता बाद में करना भैया
पहले रखना इनका पूरा ध्यान!

मल-मल कर गुटका मुंह में डालकर
हुए हम चिंता मुक्त हाथ झाड़कर
जब सर्वसुलभ वस्तु अनमोल बनी यह
फिर क्यों छोड़े? क्या घर, क्या दफ्तर!

हम चले सफ़र को बस में बैठकर
जब रुकी बस लाये हम बीडी-गुटका खरीदकर
सड़क अपनी चलते-फिरते सब लोग अपने
फिर काहे की चिंता? गर थूक दे इधर-उधर

सुना था रामराज में बही दूध की नदियाँ
और कृष्णराज में मक्खन-घी खूब मिला
पर आज गाँव-शहर में बहती दारु की नदियाँ
देख गटक दो घूंट फतह कर लो हर किला

अमीर-गरीब, पढ़ा-लिखा, अनपढ़ यहाँ कोई भेद नहीं
सब मिल बैठ बड़े मजे से खा-पीकर खूब रंग जमाते!
बिना खाए-पिए गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी भैया!
गली-सड़क, मोहल्ले, घर-भर यही बतियाते!

-Kavita Rawat

18 comments:

रश्मि प्रभा... said...

bahut sahi

मनोज कुमार said...

मूल्य निर्णय न देकर व्यंग्यात्मक ब्याख्यान अच्छा लगा।

संजय भास्‍कर said...

u r write kavita ji..

संजय भास्‍कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Apanatva said...

sunder prastuti .

Yogesh Verma Swapn said...

sunder prastuti.

Udan Tashtari said...

सटीक अभिव्यक्ति!

पी.एस .भाकुनी said...

bahut-bahut dhanyavad aapka,mai prayas kr raha hun, prerna ke liye aap logon ka sahyog or margdarshan chahiye ki main bhi blog ki is duniya mai muththi bhar jameen hasil kar sakun, thanks once again......

अजय कुमार said...

सही कहा आपने , लोगों के जीवन में घुस गया है

BrijmohanShrivastava said...

कविता और उसमे भी व्यंगात्मक ।बिना खाये पिये गाड़ी कैसे बढेगी ।आजकल कुछ ज्यादा ही शौक बढता चला जा रहा है

Apanatva said...

sambodhan accha laga bete bas ek salah hai jee hata do chaho to see lagao varna aise bhee chalega.....

कडुवासच said...

.... बेहद प्रभावशाली !!!

निर्मला कपिला said...

कविता जी बहुत अच्छा व्यंग है सही मे आज कल रोटी खाने को मिले न मिले मगर नशा जरूरी है समाज मे फैली दुर्व्यस्न की परकाष्ठा पर अच्छा व्यंग शुभकामनायें

shama said...

अमीर-गरीब, पढ़ा-लिखा, अनपढ़ यहाँ कोई भेद नहीं
सब मिल बैठ बड़े मजे से खा-पीकर खूब रंग जमाते!
बिना खाए-पिए गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी भैया!
गली-सड़क, मोहल्ले, घर-भर यही बतियाते!
Antarmukh kar diya aapne!

दिगम्बर नासवा said...

बीडी-सिगरेट, दारू, गुटका-पान
आज इससे बढ़ता मान-सम्मान
दाल-रोटी की चिंता बाद में करना भैया
पहले रखना इनका पूरा ध्यान ...

सटीक व्यंग है आज की सामाजिक हालात पर ......... समाज की दिशा बदलती जा रही आई ...... मूल्य बदल रहे हैं .......

Unknown said...

nashe ke bare mein aapka ye vyang aapki gahan peeda se ubhra hai esliye ye kewal vyang nahi hai ...peeda se uthi aawaj hai jo ese kavita ke kareeb le jati hai....aapki ye kavita aaj ki jarurat hai ...hardik badhai

शरद कोकास said...

इस कविता का पर्चा बनवाकर बँटवा दिया जाये ?

yashoda Agrawal said...

सादर नमन
बिना सूचना
कल के पाँच लिंकों का आनन्द में ये रचना प्रकाशिक होगी
सादर