आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से शुरू होकर शारदीय नवरात्रि की शुरुआत तक चलने वाला समय 'पितृपक्ष' कहलाता है। यह पखवाड़ा हमारे दिवंगत पूर्वजों (पितरों) के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आदर प्रकट करने का पावन समय है। सनातन परंपरा में अपने पितरों की शांति और उनकी स्मृतियों को नमन करने के लिए श्राद्ध कर्म का विशेष विधान है। यद्यपि देश भर में कई स्थानों पर श्राद्ध किया जाता है, परंतु बिहार स्थित गया धाम में पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने का महत्व सर्वोपरि माना गया है।
पौराणिक मान्यताओं, धर्मशास्त्रों और ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार गया धाम में श्राद्ध करने का विशेष महत्व निम्नलिखित कारणों से है:
1. गयासुर की कथा और भगवान विष्णु का वरदानगया धाम के मोक्ष तीर्थ बनने के पीछे 'गयासुर' नाम के दैत्य की कथा जुड़ी है। कथा के अनुसार, गयासुर के कठोर तप और दुष्कर्मों से जब सृष्टि व्याकुल हुई, तब भगवान विष्णु ने स्वयं आकर अपने दाहिने पैर से उसे इसी स्थान पर दबा दिया था। जब गयासुर भगवान विष्णु के चरणों तले दबकर मोक्ष प्राप्त कर रहा था, तब उसने श्रीहरि से वरदान मांगा कि यह क्षेत्र उसी के नाम से प्रसिद्ध हो और यहाँ आने वाले प्रत्येक जीव को मोक्ष मिले।
भगवान विष्णु के वरदान स्वरूप यह क्षेत्र 'गया धाम' कहलाया। आज भी यहाँ भगवान विष्णु के चरण चिन्ह मौजूद हैं, जिसे विष्णुपद मंदिर के नाम से जाना जाता है। पूरे संसार में श्रीहरि के पदचिन्हों का यह इकलौता मंदिर है।
2. धर्मशास्त्रों और वायुपुराण में गया क्षेत्र की महिमा
धर्मशास्त्रों के अनुसार, जब तक किसी मृत व्यक्ति का पितृपक्ष में विष्णुपद पर पिंडदान नहीं किया जाता, तब तक उसकी आत्मा प्रेतयोनि में भटकती रहती है। गया में पिंडदान के पश्चात ही जीव को पितृलोक में स्थान प्राप्त होता है।
वायुपुराण में गया की महिमा गाते हुए कहा गया है:"न त्यक्तव्यं गयाश्राद्धं सिंहस्थे च वृहस्पतौ। अधिमासे सिंह-गुरावस्ते च गुरु-शुक्रयोः। तीर्थयात्रा न कर्तव्या गयां गोदावरीं विना।"
इसी प्रकार वायुपुराण का एक अन्य कथन है— "पंचकोश गया क्षेत्र कोशमेकं गयाशिरः" अर्थात्, गया के पांच कोस के दायरे में जिसकी मृत्यु होती है, उसे अलग से श्राद्ध की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ही गयासुर का शरीर और मोक्षदायिनी भूमि है।
शास्त्रों के अनुसार पहले गया में 365 वेदियां थीं (क्योंकि प्रतिदिन श्राद्ध का विधान माना गया है), जिनमें से वर्तमान में 45 वेदियां ही शेष बची हैं। इसके अतिरिक्त, परमपिता ब्रह्मा जी ने भी गयासुर के शरीर पर विशाल यज्ञ किया था और 'ब्रह्म सरोवर' में यज्ञ स्तंभ स्थापित किया था। 3. माता सीता द्वारा पिंडदान और चार साक्षियों की कथा
गया धाम का संबंध त्रेतायुग में भगवान श्रीराम और माता सीता से भी जुड़ता है। वनवास से लौटने के बाद प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता अपने पिता महाराजा दशरथ का पिंडदान करने गया पहुँचे थे।
- जब श्रीराम और लक्ष्मण पिंडदान की सामग्री लेने गए, तब पिंडदान का शुभ मुहूर्त निकलने लगा। उसी समय महाराजा दशरथ की आत्मा ने प्रकट होकर माता सीता से पिंड (भोजन) की मांग की। समय का महत्व समझते हुए माता सीता ने फल्गु नदी, केतकी के फूल, गाय और वटवृक्ष (बरगद) को साक्षी मानकर बालू (रेत) का पिंड बनाकर अर्पित कर दिया, जिससे महाराजा दशरथ की आत्मा पूर्णतः तृप्त हो गई।
- जब श्रीराम सामग्री लेकर लौटे और माता सीता ने पूरा वृत्तांत बताया, तो श्रीराम को विश्वास नहीं हुआ। माता सीता द्वारा बुलाए जाने पर फल्गु नदी, केतकी का फूल और गाय अपनी बात से मुकर गए, जबकि केवल वटवृक्ष ने सत्य की गवाही दी। इससे कुपित होकर माता सीता ने:
- फल्गु नदी को श्राप दिया कि वह केवल बालू के नीचे बहती रहेगी और ऊपर से सूखी दिखेगी।
- केतकी के फूल को पूजा-पाठ में अयोग्य होने का श्राप दिया।
- गाय को श्राप दिया कि उसके मुख से छुई वस्तु पूजा में अयोग्य मानी जाएगी।
- वटवृक्ष को सत्य बोलने पर दीर्घायु और अखंड सौभाग्य का वरदान दिया। यही कारण है कि आज भी सुहागिन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए वटवृक्ष की पूजा करती हैं।
शास्त्रों में समय अनुसार श्राद्ध करने का विधान बताया गया है:
पितृ श्राद्ध: पूर्वाह्न (सुबह) के समय।
पूर्वज श्राद्ध: अपराह्न (दोपहर के बाद) के समय।
एकदिष्ट श्राद्ध: मध्याह्न (दोपहर) के समय।
नित्य-नैमित्तिक श्राद्ध: प्रातःकाल के समय।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए तर्पण और श्राद्ध नहीं करता, वह सत्पुत्र कहलाने का अधिकारी नहीं होता। समय पर भक्तिभाव से किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्त करता है और वे प्रसन्न होकर कुल की वृद्धि व समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
— कविता रावत


10 टिप्पणियां:
अध्यात्मिक और बौद्धिक दोनो तरह की जानकारी मिलती है इस लेख से ,बहुत बढियां
अध्यात्मिक और बौद्धिक दोनो तरह की जानकारी मिलती है इस लेख से ,बहुत बढियां
गया में श्राद्ध व पिंडदान के बारे में बहुत अच्छी ज्ञानवर्धक जानकारी लिखी है आपने ...
Acchi jaankari
Acchi jaankari
बहुत बढ़िया पोस्ट। जानकारी ताजा हुई..आभार आपका।
गया का महत्व भगवान शंकर ने भी बताया है ।इसलिए गया मे पिंड दान अधिक किये जाते है ।
जानकारी युक्त पोस्ट ... बहुत अच्छी .
बहुत ज्ञानवर्द्धक जानकारी.
हमारे संस्कृति के मूल में कितनी कथाएं प्रचलित हैं और जब ये कथाएं अपने युग पुरुष से जुड़ जाती हैं तो सहज विश्वास और श्रद्धा उमड़ आती है मन में ... ये बात पितृ पक्ष पे भी लागू होती है ... और शायद यही बातें समाज को जोड़े भी रखती हैं ...
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