अनुभवों की थाती और प्रकृति का सान्निध्य - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025

अनुभवों की थाती और प्रकृति का सान्निध्य

परिवेश: अभावों में सुवास की खोज
हम एक चार मंजिला सरकारी आवास के भूतल (Ground Floor) पर रहते हैं। शहरी जीवन की विडंबना देखिए कि ऊपरी मंजिलों पर रहने वालों की असंवेदनशीलता के कारण हमारा आंगन अक्सर कूड़ेदान में तब्दील हो जाता है। किंतु, इसी भूतल के हिस्से में एक वरदान भी छिपा है—बागवानी के लिए उपलब्ध पर्याप्त भूमि। बचपन में जो पौधरोपण मात्र एक खेल था, आज पर्यावरण की गिरती स्थिति और कटते वनों को देखकर वह एक गंभीर सरोकार और आत्मिक पीड़ा बन गया है।
दादी का आगमन: आंगन में लौटा वसंत
घर की रौनक बच्चों की किलकारियों और बुजुर्गों की गरिमामयी उपस्थिति से ही होती है। हमारे पड़ोस में जब एक 'दादी' अपने सपरिवार रहने आईं, तो लगा जैसे घर से रूठा हुआ वसंत वापस लौट आया है। ७५ वर्षों का अनुभव समेटे दादी 'स्वावलंबन' की प्रतिमूर्ति हैं। भोर होते ही आंगन बुहारना, पौधों को सींचना और मिट्टी के चूल्हे पर पानी गर्म करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। वे केवल अपने परिवार की ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले की 'साझी दादी' बन गई हैं।
संवेदना और सरोकार: अनुभव की तिजोरी
दादी का लगाव आधुनिक मनोरंजन (टेलीविजन) से अधिक देश-दुनिया की खबरों और प्रकृति के संरक्षण में है। उनके पास अनुभवों की एक अमूल्य तिजोरी है। वे अक्सर भावुक होकर पुरानी शुद्धता को याद करती हैं—जब न उद्योगों का धुंआ था, न नदियों में घुलता रसायनों का जहर। वे कहती हैं कि बढ़ती जनसंख्या और कंक्रीट के जंगलों ने हमसे शुद्ध हवा, जल और अन्न सब छीन लिया है। पर्यावरण का यह असंतुलन आज उनके लिए ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के लिए गहरी चिंता का विषय है।
   

संकल्प: बंजर से हरियाली तक का सफर
प्रकृति के प्रति हमारी समान विचारधारा ने हमें एक-दूसरे के बेहद करीब ला दिया है। मैंने और दादी ने मिलकर जन-जागरूकता का बीड़ा उठाया है। इसकी शुरुआत हमने अपने घर के आंगन और सामने पड़ी बंजर भूमि को आबाद करके की। आज वहाँ एक लहलहाती 'बाड़ी' है, जहाँ विविध फल, फूल और सब्जियां अपनी छटा बिखेर रही हैं।
शहरी परिवेश में पौधों को रोपना सरल है, किंतु उन्हें आवारा पशुओं और शरारती तत्वों से बचाना एक दुर्गम चुनौती। लेकिन दादी के जीवट और सतत निगरानी ने इस बाड़ी को पूरी तरह सुरक्षित (महफूज) कर दिया है।
निष्कर्ष: वसंत का संदेश
आज हमारे आंगन के गमलों में गुलाब, सदाबहार और गेंदे की महक है, तो दूसरी ओर सड़क किनारे हमारी बाड़ी में सरसों के पीले फूलों ने 'वासंती आभा' बिखेर दी है। कंक्रीट की इस भागती-दौड़ती दुनिया में हमारी यह छोटी सी हरियाली हर आने-जाने वाले को वसंत के आगमन और प्रकृति की महत्ता का मूक संदेश दे रही है। 
....कविता रावत



11 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर। वसन्त पंचमी की शुभकामनाएं।

Anuradha chauhan ने कहा…

बहुत सुंदर बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

वसन्त पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें। हाँ प्रयास अच्छा है।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन टीम की और मेरी ओर से आप सब को बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा पर बधाइयाँ और हार्दिक शुभकामनाएँ |


ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 10/02/2019 की बुलेटिन, " बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा पर बधाइयाँ और हार्दिक शुभकामनाएँ “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शुरुआत खुद से हो तो दुसरे पर उसका भरपूर प्रभाव पड़ता है ...
आपने और दादी ने मिल के जो बीड़ा उठाया है उसे जरूर सफलता मिलेगी ... अनुभव और जोश मिल के बहुत कुछ कर जाता है ... सार्थक विचार सार्थक पोस्ट ...

मन की वीणा ने कहा…

वाह सुंदर सार्थक सृजन ।

संजय भास्‍कर ने कहा…

वसन्त पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें।

Kamini Sinha ने कहा…

बहुत सुंदर ,सार्थक लेख ,दादी को मेरा भी नमस्कार

Meena sharma ने कहा…

आदरणीया कविताजी,मुझे भी बागवानी का बहुत शौक है। आपने यह सही कहा कि शहरों में पौधों को लगाना उतना कठिन नहीं है, जितना उनको महफ़ूज रखना। दादी जैसे बुजुर्ग अपना सामाजिक दायित्व खूब समझते हैं और उनकी बदौलत नई पीढ़ी भी बसंत बहार के रंगों और खुशबुओं से रूबरू होती है वरना इस सीमेंट के जंगलों में तो बसंत भी कोई ऋतु होती है ये पता ही नहीं चलता।

Virendra Singh ने कहा…

प्रेरक विचार। बुजुर्गों की बात ही अलग है। बड़े बदनसीब होते होंगे वे लोग जो इन्हें अपने से दूर कर देते हैं। वाकई दिल को छू लेने वाले विचारों के लिए आपको बधाई।

बेनामी ने कहा…

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