मथुरा एवं श्रीधाम वृन्दावन: संस्कृति, इतिहास और भक्ति का दिव्य संगम - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 1 सितंबर 2026

मथुरा एवं श्रीधाम वृन्दावन: संस्कृति, इतिहास और भक्ति का दिव्य संगम

मथुरा का ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व
मथुरा प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति, धर्म, कला और साहित्य के विकास का प्रमुख केंद्र रही है। यह पावन नगरी प्राचीन भारत के शक्तिशाली यदुवंशियों के ‘शूरसेन’ गणराज्य की राजधानी थी। मनुस्मृति, महाभारत, वाल्मीकि रामायण तथा ब्रह्म, वाराह, अग्नि एवं हरिवंश पुराण जैसे ग्रंथों में इसे मथुरा, मधुपुरी, मधुपुर तथा महुरा नाम से संबोधित किया गया है। मान्यता है कि दैत्य राज मधु द्वारा बसाई गई यह नगरी भारत की मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में से एक है।
श्रीकृष्ण अवतार और कंस वध
मथुरा योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की पवित्र जन्मस्थली है। कालान्तर में शूरसेन राज्य के राजा उग्रसेन को उनके क्रूर पुत्र कंस ने बंदी बनाकर सिंहासन हथिया लिया। कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने कारागार में देवकी के गर्भ से अवतार लिया। उन्होंने अपनी लीलाओं के क्रम में अत्याचारी मामा कंस का वध कर ब्रजवासियों के कष्टों का निवारण किया, अपने माता-पिता व नाना उग्रसेन को मुक्त कराकर पुनः राजसिंहासन सौंपा और मगध नरेश जरासंध के बारंबार आक्रमणों का अपनी कुशल कूटनीति से अंत कराया। महाभारत युद्ध में अर्जुन के मोह का निवारण करते हुए उन्होंने ज्ञान, कर्म और भक्ति के समन्वय से 'भागवत धर्म' का प्रवर्तन किया, जिससे वे 'जगद्गुरु' रूप में प्रतिष्ठित हुए।
  

मथुरा को पहले मधुपुरी भी कहा जाता था। कहते हैं, इसे मधु नामक दैत्य ने बसाया था। कालांतर में यह शूरसेन राज्य की राजधानी बनी और उसी वंशानुक्रम में उग्रसेन के आधिपत्य में आयी। राजा उग्रसेन का कंस नामक क्रूर पुत्र था, जिससे मगध के घोर आततायी राजा जरासंध की अस्ति-नस्ति नामक दो कन्याएं ब्याही थी। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया था और स्वयं स्वेच्छाधारी राजा के रूप में मथुरा के सिंहासन पर आरूढ़ हो गया। उसी क्रूर अत्याचारी कंस ने अपनी चचेरी बहिन देवकी तथा उसके पति वसुदेव को एक आकाशवाणी के कारण स्वयं को निर्भय रखने के विचार से जेल में डाल दिया था। कंस तथा उसके क्रूर शासन को समाप्त करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से कारागृह में जन्म लिया और अद्भुत लीलाओं के क्रमों का विकास करते हुए अपने मामा कंस का वध करके ब्रजवासियों के कष्टों को दूर किया। उन्होंने अपने माता-पिता तथा नाना उग्रसेन को कारागृह से मुक्त करके उन्हें पुनः सिंहासन पर बिठाया।  अपने जामाता कंस के मारे जाने पर जरासंध श्रीकृष्ण से बार-बार युद्ध करता रहा, लेकिन वह अंत में श्रीकृष्ण की कूटनीति के जाल में फंसकर भीम द्वारा मृत्यु को प्राप्त हुआ। 

वृन्दावन: लीलाभूमि और रसमय भक्ति का केंद्र
जिस प्रकार राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं, उसी प्रकार वृन्दावन के बिना मथुरा अधूरी है। भले ही मथुरा भगवान् श्रीकृष्ण की जन्मस्थली है, लेकिन उनकी दिव्य लीलाओं के नाम के लिए वृन्दावन प्रसिद्ध है। वृन्दावन ब्रज का हृदय है, जहां श्री राधाकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलायें की हैं। इस पावन भूमि को पृथ्वी का अति उत्तम तथा परम गुप्त भाग कहा गया है। पदम् पुराण में इसे भगवान का साक्षात् शरीर, पूर्ण ब्रह्म से संपर्क का स्थान तथा सुख का आश्रय बताया गया है। इसी कारण यह अनादि काल से भक्तजनों का श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। महाकवि सूरदास, संगीत के आचार्य स्वामी हरिदास, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी दयानन्द के गुरु स्वामी विराजानन्द, कवि रसखान आदि महान आत्माओं ने इसके वैभव को सजाया-निखारा है। यहां आनन्दकंद युगल किशोर श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा की अद्भुद नित्य विहार लीला होती रहती है।
वृन्दावन की प्राकृतिक छटा दर्शनीय है। यमुना इसको तीन ओर से घेरे हुए है। यहां सघन कुंजों में भांति-भांति के पुष्पों से शोभित लताएं और ऊंचे-ऊंचे घने वृक्ष मन में उल्लास भरते हैं। बसंत ऋतु के आगमन की छटा और सावन-भादों की हरियाली आंखो को जो शीतलता प्रदान करती है, वह श्रीराधा-माधव के प्रतिबिम्बों के दर्शनों का ही प्रतिफल है।  
वृन्दावन का कण-कण रसमय है। यहां प्रेम-भक्ति का ही साम्राज्य है। इसे गोलोक धाम से अधिक बढ़कर माना गया है। यही कारण है कि हजारों धर्म-परायण लोग यहां अपने-अपने कामों से अवकाश प्राप्त कर अपने शेष जीवन को बिताने के लिए निवास स्थान बनाकर यहां रहते हैं, जहां वे नित्य प्रति रास लीलाओं, साधु-संगतों, हरिनाम-संकीर्तन, भागवत आदि ग्रन्थों के होने वाले पाठों में सम्मिलित होकर धर्म-लाभ करते हैं।
... कविता रावत 
   आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!                     

17 टिप्‍पणियां:

Roshan Chaudhray ने कहा…

wow Nice

Unknown ने कहा…

सुन्दर सामयिक लेख......................
जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें!

Unknown ने कहा…

जुझारु सोच के साथ प्रभावशाली खूबसूरत लेखन । कविता जी नमन नमन नमन ।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

हमारे प्रिय कृष्ण की लीला भूमि का इतना सुन्दर विवरण... मन प्रसन्न हो गया!!

डॉ. दिलबागसिंह विर्क ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25 - 08 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2445 {आंतकवाद कट्टरता का मुरब्बा है } में दिया जाएगा |
धन्यवाद

Harihar (विकेश कुमार बडोला) ने कहा…

सब कुछ उत्‍कृष्‍ट। विषय, जानकारी, वर्णन, वर्णन-भाषा। इसके साथ ही इस आलेख में तत्‍कालीन समयकाल के उत्‍स से आज के समयकाल को मिल सकनेवाले महत्‍त्‍वपूर्ण लाभ भी आलेख में अत्‍यंत मनोस्थिरता और रुचिता के साथ प्रस्‍तुत किए हैं आपने। इस आलेख हेतु आपको बहुत-बहुत बधाई।

Satish Saxena ने कहा…

बढ़िया वर्णन !! मंगलकामनाएं ..

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर ।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

कविता जी, जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें! बहुत बढिया वर्णन एवं चित्र संयोजन किया है आपने!

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

सबसे उत्कृष्ट गृहस्थी, सखा,शिष्य,गुरू,योद्धा,पालनहार,संहारक,तथा योगी व सन्यासी थे,इसीलिये पूर्णावतार कहे गये।

ज्योति-कलश ने कहा…

बहुत सुन्दर ,सरस प्रस्तुति ...शुभ जन्माष्टमी !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मथुरा के इतिहास से लेकर कृष्ण लीला और व्रन्दावन होते हुए बहुत ही लाजवाब और तार्किक दृष्टि से इस लेख को लिखा अहि .... रोचक और कृष्ण की माया के साथ आपको जन्माष्टमी की बधाई ....

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर सार्थक पोस्ट .... आपको भी हार्दिक शुभकामनाएं जन्माष्टमी की

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'युगपुरुष श्रीकृष्ण से सजी ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

RITA GUPTA ने कहा…

बेहतरीन आलेख. वाह क्या खूब लिखा आपने.

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

मोहक छवियों से सजा सुंदर आलेख ।
शुभकामनाएँ ।

nayee dunia ने कहा…

वाह , बहुत अच्छी जानकारी ...आभार

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