सूरज ढला है तो फिर सुबह भी आएगी ही
कविता रावत
फ़रवरी 14, 2026
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हाथों की लकीरों सा पाला था जिन्हें, आज वे ही हाथ अनजानी राहों पर चल पड़े। जिनकी मुस्कान के लिए बेच दी थी अपनी रातें, आज वे ही अपनी दुनिया के ...
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