गाँव छोड़ शहर को धावै
कविता रावत
अक्टूबर 31, 2010
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गाँव छोड़ शहर को धावै करने अपने सपने साकार खो चुकें हैं भीड़-भाड़ में आकर बन बैठें हैं लाचार! निरख शहर में जन-जन को बिखरते सपने टूटत...
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