'ख' के खेल और जीवन के मेल (3) | हिंदी मुहावरा-माला | - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शनिवार, 13 जून 2026

'ख' के खेल और जीवन के मेल (3) | हिंदी मुहावरा-माला |

 
'खाक में मिलना'  से 'खार खाना/निकालना'  तक जानिए 'वर्ण से जुड़े मुहावरों की बेहद खूबसूरत काव्यात्मक रूप।

अहंकार के जाल में जो डूबा, उसका 'खाक में मिलना' तय है,

अत्याचारी की 'खाल सियाह करना', नियति का ही न्याय-विनय है।

 

किसी के सपनों का 'खाका उड़ाना', उपहास करना भारी पाप है,

क्रोध में 'कच्चा खा जाना' किसी को, खुद का ही संताप है।

 

घेरा रोग ने ऐसा असमय, कि उसने 'खाट पकड़ी' लाचार होकर,

अब तो 'खाट लगी' है ऐसी, कि दिन कटते हैं सिसक-सिसक कर।


अंत समय जब 'खाट से उतारा' जाए, तब छूटती यह दुनिया सारी,

कर्मों का लेखा-जोखा ही बस, साथ निभाता है बारी-बारी।

 

कायर मत बनो, अन्याय की 'खाट खड़ी करना' सदा सीखो तुम,

सत्कर्मों की पूँजी ही अंत में, 'खाते में पड़ना' है, यह जानो तुम।

 

जो मद में चूर रहा सदा, वह किसी को 'खातिर में न लाया',

दूसरों की तरक्की देख, ताउम्र बस 'खार खाता' ही नज़र आया।


पर वैर-भाव का यह विषैला कुआँ, कभी किसी का भला न कर पाया,

आज मौका पाकर उसने, अपने ही दिल की 'खार को निकाला' और पछताया।

... कविता रा

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