खिचड़ी से खड़ी सवारी तक: 'ख' वर्ण के मुहावरों की काव्य-यात्रा (4) - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपनी कविता, कहानी, गीत, गजल, लेख, यात्रा संस्मरण और संस्मरण द्वारा अपने विचारों व भावनाओं को अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का हार्दिक स्वागत है।

शनिवार, 13 जून 2026

खिचड़ी से खड़ी सवारी तक: 'ख' वर्ण के मुहावरों की काव्य-यात्रा (4)

 
'खिचड़ी पकना/पकाना' से 'खड़ी सवारी आना' तक जानिए 'वर्ण से जुड़े मुहावरों की बेहद खूबसूरत काव्यात्मक रूप।


षड्यंत्रों की जो 'खिचड़ी पकाते', वे सम्मुख कभी न आते हैं,

बात-बात पर जो खीस काढ़ते, वे केवल अपना उपहास कराते हैं।

 

अहंकार का 'खुमार तोड़ना' ही, मानवता की पहली सीढ़ी है,

डर तजकर अब 'खुलकर खेलना', माँग रही यह नई पीढ़ी है।

 

दानवीर की 'खुली मुट्ठी', जग का कल्याण कर देती है,

मेहनती की जिद्द हर मरुथल में, अपना 'खूँटा गाड़' देती है।

 

जब प्रयत्न 'खटाई में पड़' जाए, तो 'मन खट्टा' होना लाज़मी है,

पर अडिग रहे जो संकट में, वही पुरुषार्थ की असली ज़मी है।

 

विपदा में जब 'खड़ी पछाड़ें' खाता मन, कोई सहारा नहीं मिलता,

अचानक जब 'खड़ी सवारी' काल की आए, फिर रोने का भी वक़्त नहीं मिलता।

...Kavita Rawat

कोई टिप्पणी नहीं:

क्या आपको यह रचना पसंद आई?

ऐसी ही और रचनाओं के लिए मुझसे जुड़ें: