आज 'वर्ल्ड अपसाइकिलिंग डे' है। सोशल मीडिया और रोज़मर्रा की व्यस्तताओं के बीच अक्सर ऐसे दिन चुपके से गुज़र जाते हैं, लेकिन पर्यावरण के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी का एहसास हमें ठहरने पर मजबूर कर देता है। आम बोलचाल में कहें तो आज 'कबाड़ से जुगाड़' का दिन है।
जब हम भोपाल के बड़े तालाब के किनारे कबाड़ से बनी ख़ूबसूरत 'वीणा' को देखते हैं, या रोशनपुरा (न्यू मार्केट) में पुराने समय के उस विशाल रेडियो की कलाकृति को निहारते हैं जिस पर 'एफएम' लिखा है, तो समझ आता है कि कला कबाड़ को भी अमर कर सकती है। हमारा शहर ऐसी कई ख़ूबसूरत कलाकृतियों से सज़ा है। लेकिन आज, मैं कला से इतर एक ऐसे 'जुगाड़' की बात करना चाहती हूँ जो सीधे हमारी साँसों और धरती की हरियाली से जुड़ा है—कबाड़ में पौधे उगाना।
दिखावे का वृक्षारोपण बनाम सच्ची देखभाल
जैसे ही मानसून की पहली फुहार पड़ती है, सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं और व्यक्तिगत स्तर पर पेड़ लगाने की होड़ मच जाती है। अख़बारों के पन्ने और टीवी चैनल 'जन-जागरूकता' की तस्वीरों से भर जाते हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि पेड़ लगाना जितना आसान है, उसकी देखभाल कर उसे बड़ा करना उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल।
"यह जागरूकता अभियान अक्सर किसी मैच की तरह होते हैं, जो मैदान से बाहर आते ही कुछ दिनों में जनता की यादों से ग़ायब हो जाते हैं। बिना देखभाल के वे पौधे बारिश ख़त्म होते ही दम तोड़ देते हैं।"
हम इस दिखावे की संस्कृति को बदलकर एक सच्चा बदलाव लाना चाहते हैं। हम सिर्फ़ पौधा लगाते नहीं हैं, बल्कि इधर-उधर से बीज या छोटे पौधे लाकर उन्हें सहेजते हैं, उनकी संपूर्ण देखभाल करते हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनने तक पालते हैं।
बिना पैसे खर्च किए घर के कबाड़ से बनाएँ 'नर्सरी'
पेड़-पौधे उगाने के लिए आपको महंगे गमले ख़रीदने की बिलकुल ज़रूरत नहीं है। हमारे घरों से निकलने वाला ऐसा कबाड़, जिसमें नीचे पेंदा हो और पानी निकलने के लिए आसानी से छेद (Drainage hole) किया जा सके, पौधों के लिए सबसे बेहतरीन घर बनता है। पानी का सही निकास इसलिए ज़रूरी है ताकि पौधों की जड़ें सड़े-गले नहीं।
आप भी हमारी तरह अपने घर में मौजूद इन चीज़ों का इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं:
- प्लास्टिक की बोतलें और डिब्बे: बिसलेरी की पुरानी बोतलें, टॉफियों के प्लास्टिक डिब्बे और फ़ास्ट फ़ूड के कंटेनर्स।
- रसोई का कबाड़: तेल के खाली पीपे, ब्रेड की खाली पन्नियाँ (ग्रो बैग की तरह)।
- घरेलू कचरा: पेंट की पुरानी बाल्टियाँ, थर्माकोल के बॉक्स, कंस्ट्रक्शन के बचे हुए ड्रेनेज पाइप।
- पारंपरिक व प्राकृतिक कबाड़: नारियल पानी पीने के बाद बचे खोखे, पुराने फेंके हुए मटके और मटकियाँ।
इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि कैसे इन बेकार समझी जाने वाली चीज़ों में नन्हें पौधे मुस्कुरा रहे हैं। हम इन सभी कबाड़ की चीज़ों का उपयोग करके पौधे तैयार करते हैं। जब ये पौधे थोड़े बड़े और मज़बूत हो जाते हैं, तब हम इनके आकार और प्रकार के अनुसार सही जगह का चुनाव करके इन्हें रोपते हैं। इतना ही नहीं, हम इन पौधों को उन लोगों को मुफ़्त में वितरित भी करते हैं जो इनकी सच्चे दिल से देखभाल करने की ज़िम्मेदारी लेते हैं।
आइए, इस वर्ल्ड अपसाइकिलिंग डे पर हम सिर्फ़ तस्वीरें खिंचवाने के लिए पेड़ न लगाएँ। घर के कबाड़ को नया जीवन दें और उससे प्रकृति को एक नया जीवन उपहार में दें। याद रखिए, पृथ्वी को रोपे गए पौधों की नहीं, जीवित बचे पेड़ों की ज़रूरत है!
...कविता रावत




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