आधुनिकता की दौड़ और गांव की यादें
"लगाकर पेड़ आड़ू का, शहर में गांव जी उठा,
चखा जो स्वाद उसका तो, पुराना दौर याद आया..."
बाज़ार के महंगे फलों में वो बात कहां, जो अपने हाथों से सींचे गए पेड़ के फल में होती है। आज घर के पेड़ से ताज़ा आड़ू तोड़े, तो दिल बाग-बाग हो गया। स्वाद बिल्कुल वैसा ही—सच्चा और मीठा!
गांव की बात ही कुछ और होती है। वहां की सुबह पक्षियों की चहचहाहट से होती है, हवाओं में शुद्धता होती है और पेड़ों से सीधे फल तोड़कर खाने का वो देसी, अल्हड़ मज़ा जीवन को तृप्ति से भर देता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब शहरों के कंक्रीट के जंगलों में आ बसे हैं। बहुमंजिला इमारतों, गाड़ियों के धुएं और व्यस्त दिनचर्या के बीच कहीं न कहीं हमारे भीतर का वो 'गांव' छूटता जा रहा है। लेकिन क्या शहर में रहकर हम अपनी जड़ों की ओर नहीं लौट सकते?
इसी सवाल के जवाब में हमने प्रकृति के प्रति अपने प्रेम के कारण शहर में अपने घर के बगीचे में दूसरे पेड़ पौधों के साथ ही एक आड़ू (Peach) का पौधा लगाया था। दिन बीतते गए, हम उसे सींचते, उसकी देखभाल करते रहे तो वह पौधा एक सुंदर पेड़ में तब्दील हो गया।
और आज... आज वह दिन आया जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार था। उस पेड़ पर लगे रसीले, ताज़ा आड़ू देखकर मन खुशी से झूम उठा। जब हमने अपने हाथों से उन फलों को तोड़ा और चखा, तो स्वाद बिल्कुल वैसा ही था—सच्चा, मीठा और शुद्ध! बाज़ार के केमिकल और कोल्ड स्टोरेज वाले फलों में वो स्वाद कहां, जो अपनी मेहनत से उपजाए गए फल में होता है। इस मीठे सुअवसर ने एक पल में मुझे मेरे गांव की याद दिला दी।
गमले से वैश्विक धरातल तक: पर्यावरण का एक मौन संदेश
यह केवल एक फल तोड़ने या उसे खाने की व्यक्तिगत खुशी नहीं है; इसके पीछे एक बहुत बड़ा वैश्विक संदेश छिपा है। आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming), जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के संकट से जूझ रही है। कंक्रीट के बढ़ते जाल ने हरी-भरी धरती को हमसे छीन लिया है। ऐसे में यह आड़ू का पेड़ हमें सिखाता है कि प्रकृति कभी किसी की कर्जदार नहीं रहती। आप उसे थोड़ा सा स्थान और प्यार दीजिए, वह आपको बदले में छांव और मीठे फल देगी।
"यदि हर व्यक्ति शहर के अपने छोटे से घर में, चाहे वो बालकनी हो या छत, एक पौधा लगाने का संकल्प ले ले, तो हम शहरों के बढ़ते तापमान को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं।"
शहरी वानिकी (Urban Forestry) क्यों ज़रूरी है?
- कार्बन फुटप्रिंट में कमी: हमारे लगाए छोटे-छोटे पौधे भी शहर की ज़हरीली हवा को साफ करने में मदद करते हैं।
- जैव विविधता का संरक्षण: कंक्रीट के इस दौर में जब हम घर में पेड़ लगाते हैं, तो पक्षियों, तितलियों और मधुमक्खियों को एक नया आशियाना मिलता है।
- मानसिक स्वास्थ्य और सुकून: प्रकृति के करीब रहना तनाव को कम करता है। सुबह उठकर अपने हाथ के लगाए पेड़ को फलता देखना किसी थेरेपी से कम नहीं है।
आइए, अपनी धरती को फिर से हरा-भरा बनाएं
हमारा उद्देश्य अपने बगीचे के पेड़ पौधों का व्यक्तिगत प्रचार प्रसार कर अपनी वाहवाही लूटना कदापि नहीं, बल्कि एक आमंत्रण है। आमंत्रण इस बात का कि आइए, हम सब मिलकर अपनी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा सा समय निकालें और प्रकृति से दोबारा नाता जोड़ें।
ज़रूरी नहीं कि आपके पास बहुत बड़ा बगीचा हो; शुरुआत एक छोटे से गमले से भी हो सकती है। जब शहर के एक कोने में गांव का फल लहलहा सकता है, तो हमारी कोशिशों से यह पूरी दुनिया फिर से हरी-भरी और जीने लायक बन सकती है।
आज ही एक पौधा लगाइए, क्योंकि प्रकृति बचेगी, तभी तो हम बचेंगे!
यदि आपको यह प्रयास और विचार पसंद आया हो, तो इसे अपने मित्रों के साथ शेयर करें और मुझे कमेंट बॉक्स में बताएं कि आपने अपने घर में कौन सा पौधा लगाया है? आप इस दिशा में किस तरह सहयोग कर रहे हैं?
... कविता रावत


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें