जीवन का कोलाहल और प्रकृति का संगीत - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 23 जून 2026

जीवन का कोलाहल और प्रकृति का संगीत

वैसे तो हमारे घर के सदस्य—'ओप्पो' और 'ओरियो' (हमारे प्यारे मिट्ठू)—किसी बच्चे से कम नहीं हैं, लेकिन हाल ही में जब टेस्ट ट्यूब तकनीक के माध्यम से भांजी की बिटिया का जन्म हुआ, तो कई वर्षों बाद घर में किसी इंसानी बच्चे की किलकारी गूंजी। अब आलम यह है कि घर के भीतर दो मिट्ठू और एक नन्ही परी मिलकर 'तीन बच्चों' का अनूठा कोलाहल मचाते हैं, तो वहीं घर के ठीक बाहर, खिड़की से सटे 'गोल्डन थूजा' के पौधे में एक बुलबुल के भी तीन बच्चे चहचहा रहे हैं।
घर के भीतर और बाहर, मासूमियत के इन अलग-अलग रूपों को संभालना दफ्तर के काम के साथ एक बड़ी अतिरिक्त जिम्मेदारी तो है, लेकिन इस जिम्मेदारी में भी एक असीम और अलौकिक आनंद है। दिनभर की भागदौड़ के बाद ऑफिस से घर लौटकर जैसे ही नन्ही बिटिया को गोद में उठाओ, उसका मासूम चेहरा देखते ही दिनभर की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है।
खिड़की के पार: प्रकृति की अद्भुत पाठशाला
खिड़की के दूसरी तरफ थूजा प्लांट में चहकते बुलबुल के उन तीन मासूमों को देखना भी अपने आप में एक सुखद अनुभव है। जैसे ही कोई मुख्य दरवाजे से अंदर आता है, ममता से भरी मां बुलबुल फुर्ती से सिर के ऊपर आकर मंडराने लगती है। उसका यह डराना मानो एक मूक चेतावनी होती है—"मेरे बच्चों के पास मत आना!"
     खिड़की से प्रकृति की इस अद्भुत पाठशाला को देखना बेहद दिलचस्प है। वह ममतामयी मां अपनी खास बोली में बच्चों को जिंदगी के ककहरे सिखाती है—कब सतर्क रहना है, कैसे खतरा देखकर उड़ना-भागना है, और बाहर किस तरह की आवाजें निकालनी हैं। वह बार-बार आती है, अपनी चोंच से उन्हें कीड़े खिलाती है और दुनिया में जीने का सलीका सिखाती है।
जीवन चक्र की दो विपरीत गति: एक सीख
     हमारे घर में बुलबुल पहले भी कई बार घोंसला बना चुकी है, इसलिए हमें उनके इस चक्र का गहरा अनुभव है। प्रकृति का यह गणित सचमुच हैरान कर देने वाला है:
  • मात्र 4 से 5 दिन में वे तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला तैयार करती हैं।
  • अंडे देने के ठीक 10 दिन बाद उनमें से नन्हे बच्चे बाहर आ जाते हैं।
  • और बाहर आने के अगले 10 दिनों में वे पंख फैलाकर खुले आसमान में उड़ जाते हैं।
     कुल मिलाकर 20 से 25 दिनों के भीतर एक पूरा आशियाना सजता है, नई जिंदगी आकार लेती है, आत्मनिर्भर बनती है और अनंत आकाश की ओर विदा हो जाती है। कितना अद्भुत और तीव्र है प्रकृति का यह चक्र!
     इसके विपरीत, जब मैं घर के भीतर अपनी नन्ही बिटिया को देखती हूँ, तो जीवन की एक अलग और धीमी गति का अहसास होता है। जिस बच्चे को मां के गर्भ में आने में 9 महीने लगे, उसे घुटनों के बल चलने में अगले 9 महीने लगेंगे, और खुद के पैरों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर होने में तो न जाने कितने साल लग जाएंगे।
प्रेरणा: समय का मूल्य और मातृत्व का विस्तार
     प्रकृति और इंसान के विकास की यह तुलना हमें एक गहरा जीवन-दर्शन सिखाती है। जहां प्रकृति हमें सिखाती है कि सीमित संसाधनों और कम समय में भी कैसे अपनी भावी पीढ़ी को उड़ने के काबिल बनाया जाता है, वहीं इंसानी परवरिश हमें धैर्य, निरंतरता और गहरा आत्मिक जुड़ाव सिखाती है।
     आज मेरा घर और बाहर, दोनों ही मातृत्व के इस विस्तार और जीवन के जीवंत संगीत से सराबोर हैं। यह अनुभव सिखाता है कि चाहे जीवन चक्र 25 दिन का हो या 25 वर्ष का, हर मासूमियत को संवारना और उसे उड़ने के पंख देना ही इस सृष्टि का सबसे सुंदर नियम है।
... कविता रावत 

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