हमारे घर का ‘मिनी-जंगल’: पर्यावरण की समझ या पड़ोसियों की तकलीफ? - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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रविवार, 21 जून 2026

हमारे घर का ‘मिनी-जंगल’: पर्यावरण की समझ या पड़ोसियों की तकलीफ?

आज जब शहरों का तापमान 45 डिग्री को पार कर रहा है, लोग अपने घरों में बंद होकर एसी (AC) और कूलर के भरोसे जिंदगी काट रहे हैं। लेकिन क्या कृत्रिम ठंडक हमारे जीवन को सुरक्षित बना रही है? एसी न केवल हमारी जेब पर भारी है, बल्कि हमारी सेहत और इस धरती की सेहत (ग्लोबल वॉर्मिंग) की भी ऐसी-तैसी कर रहा है।
     कंक्रीट के इस बढ़ते जंगल के बीच, हमने एक अलग रास्ता चुना। मल्टीस्टोरी बिल्डिंग के सबसे निचले फ्लोर (ग्राउंड फ्लोर) पर रहते हुए, हमने अनजाने में नहीं, बल्कि पर्यावरण की गहरी समझ के साथ सैकड़ों छोटे-बड़े पेड़-पौधे लगाए और उन्हें एक माता-पिता की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया है।
कुदरती एयर-कंडीशनर का जादू
     आज नतीजा सबके सामने है। हमारे घर में न कूलर की जरूरत पड़ती है और न एसी की। सिर्फ एक सामान्य पंखे से हमारा काम बेहद आराम से चल जाता है। विज्ञान की भाषा में इसे 'माइक्रो-क्लाइमेट मैनेजमेंट' कहते हैं। हमारे लगाए ये सैकड़ों पौधे अपनी पत्तियों से जो नमी छोड़ते हैं, वह बाहर की गर्म लू को घर के अंदर आने से पहले ही शीतल और शुद्ध ऑक्सीजन युक्त हवा में बदल देती है।
12 फीट 8 इंच ऊँची तुलसी: एक जीवित चमत्कार
    हमारे इस छोटे से जंगल में आस्था, आयुर्वेद और प्रकृति का एक अनूठा संगम है। सामान्यतः तुलसी का पौधा 3 से 4 फीट तक बढ़ता है, लेकिन हमारे बगीचे में 12 फीट 8 इंच ऊँची विशाल तुलसी लहरा रही है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि पौधों को केवल पानी नहीं, बल्कि निश्छल प्रेम और सही समझ मिले, तो प्रकृति कैसे चमत्कार दिखाती है।
अफसोस! हरियाली से भी है तकलीफ
     जहाँ इस प्रयास की सराहना होनी चाहिए थी, वहीं कंक्रीट की संकीर्ण मानसिकता से घिरे कुछ आस-पास के लोगों को इससे तकलीफ होती है। किसी को गिरती पत्तियों से शिकायत है, तो किसी को गाड़ियों की पार्किंग के सामने पौधे देखना गंवारा नहीं। कंक्रीट के इस दौर में लोगों की सोच इतनी सिमट गई है कि उन्हें सीमेंट की सूनी फर्श तो पसंद है, लेकिन जीवन देने वाली हरियाली कचरा नजर आती है। वे नहीं जानते कि जो शुद्ध हवा वे ले रहे हैं, उसमें इन्हीं पौधों का योगदान है।
मानसून का बेसब्री से इंतज़ार
     इस भीषण उमस और तपिश में, हमसे कहीं अधिक हमारे लगाए इन छोटे-बड़े सैकड़ों लाडले पौधों को मानसून की पहली बारिश का बेसब्री से इंतज़ार है। वे आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। बहुत जल्द जून के इस आखिरी हफ्ते में जब मानसून की बूंदें इन पर गिरेंगी, धूल धुलेगी और यह मिनी-जंगल झूम उठेगा, तब विरोध करने वालों की शिकायतें भी इसकी सौंधी खुशबू में गायब हो जाएंगी।
... कविता रावत

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