"बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" और "वसुधैव कुटुम्बकम" की ओर एक कदम
आज का युग विज्ञान और भौतिकवादी उन्नति का युग है। हम विकास के शिखर पर तो पहुँच रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर हमारा आध्यात्मिक और मानसिक पतन भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। आधुनिक सुख-सुविधाओं ने मनुष्य को निष्क्रिय और आलसी बना दिया है। अप्राकृतिक जीवन-शैली, दूषित खान-पान और स्क्रीन (टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर) के अत्यधिक उपयोग ने न केवल बड़ों को, बल्कि बच्चों को भी शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ कर दिया है।
ऐसे अशांत और तनावपूर्ण समय में, हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा दी गई योग की शिक्षा ही उत्तम स्वास्थ्य का एकमात्र मार्ग है।
योग की उत्पत्ति और इतिहास
प्रकृति और जीव-जंतुओं से प्रेरणा: प्राचीन काल में योगी और ऋषि-मुनि वनों और गुफाओं के एकांत में रहते थे। उन्होंने देखा कि प्रकृति के सानिध्य में रहने वाले जीव-जंतु सांसारिक रोगों से मुक्त रहते हैं। पशु-पक्षियों की गतिविधियों का सूक्ष्म अध्ययन करके ही योग की अनेक विधाओं और आसनों का विकास हुआ, इसीलिए अधिकांश आसनों के नाम जीव-जंतुओं पर आधारित हैं।
वैदिक विरासत: योग का इतिहास समय की अनंत गहराइयों में छिपा है। मानव जाति के प्राचीनतम साहित्य वेदों में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है, और कई विद्वान इसे वेदों से भी प्राचीन मानते हैं।
वैश्विक पटल पर योग का प्रभाव और अनुसंधान
योग का वैश्विक प्रसार तब हुआ जब पश्चिमी देशों के लोग इसे अपने साथ विदेश ले गए। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब युद्धबंदी जेलों में दूषित हवा, पानी और भोजन के कारण कोलाइटिस, पेचिश और रीढ़ की हड्डी के दर्द से पीड़ित थे, तब योग जानने वाले कैदियों (जैसे हॉलैंड के डॉ. पोल्डर मैन और ऑस्ट्रेलिया की रोमा ब्लेयर) ने सबको शीर्षासन, सूर्य नमस्कार और उड्डियान बंध के माध्यम से रोगमुक्त किया।
इसके बाद पश्चिमी वैज्ञानिकों ने इस पर शोध शुरू किया:
फ्रांस में बंगाल के प्रख्यात अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. दास ने अपने अनुसंधान में सिद्ध किया कि योग का प्रभाव केवल मांसपेशियों पर ही नहीं, बल्कि हमारी हड्डियों और आंतरिक तंत्र पर भी पड़ता है। अर्थात्, योग मात्र एक शारीरिक व्यायाम नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQ)
1. योग क्या है और क्यों करते हैं?
योग का शाब्दिक अर्थ है 'जुड़ना'। व्यावहारिक रूप से, यह शरीर, मन और आत्मा को एक सूत्र में पिरोने का विज्ञान है। योग का मुख्य लक्ष्य हमें परम चेतना के मार्ग पर ले जाना है ताकि हम अपने अस्तित्व को पहचान सकें। यह मनुष्य को प्रकृति के करीब लाकर उसकी जीवन-शैली को संतुलित करता है।
2. योग की आवश्यकता क्यों है?
मनुष्य कितना ही महत्वाकांक्षी क्यों न हो, स्वस्थ शरीर और शांत मन के बिना वह जीवन के किसी भी क्षेत्र (चाहे खेल हो या नौकरी) में सफल नहीं हो सकता। यदि शरीर रोगग्रस्त होगा, तो मन में भी अशांति रहेगी क्योंकि 'बेचैन शरीर से बेचैन मन को वश में नहीं किया जा सकता'। शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकारों को दूर करने के लिए आज योग की परम आवश्यकता है।
3. योग से क्या लाभ होता है?
शारीरिक लाभ: यह शरीर को चुस्त, लचीला और निरोग बनाता है। हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती देता है।
मानसिक लाभ: यह आधुनिक जीवन के तनाव, अवसाद और अशांति को दूर कर मानसिक एकाग्रता बढ़ाता है।
आध्यात्मिक लाभ: यह आत्मा को शांति प्रदान करता है और आत्मिक दुखों का शमन करता है। (सच्चे अर्थों में योगशास्त्र को देह, मन और आत्मा का 'चिकित्सा शास्त्र' कहा जा सकता है।)
4. योग कितने प्रकार के होते हैं?
भारतीय योग दर्शन के अनुसार मुख्य रूप से योग के चार मार्ग माने गए हैं:
राजयोग (अष्टांग योग): जिसमें आसन, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से मन को नियंत्रित किया जाता है।
ज्ञानयोग: विवेक और बुद्धि के माध्यम से सत्य की खोज।
कर्मयोग: फल की इच्छा के बिना निस्वार्थ भाव से कर्तव्य करना।
भक्तियोग: ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम।
'वन अर्थ, वन हेल्थ'
आज दुनिया भर के डॉक्टर और वैज्ञानिक भी स्वीकार कर चुके हैं कि निरोग रहने के लिए योग सर्वोत्तम माध्यम है। आधुनिक उपकरण जहाँ असमर्थ हो जाते हैं, वहाँ योग की क्रियाएँ काम आती हैं। आइए, इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर हम सभी योग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का संकल्प लें।
योग फॉर वन अर्थ, वन हेल्थ। वसुधैव कुटुम्बकम्।
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27 टिप्पणियां:
सुन्दर आलेख ।
सार्थक,समसामयिक और प्रेरक प्रस्तुति
निसन्देह योग विज्ञान आदि विज्ञान है।
आज की आवश्यकता है योग ...योग भगाए रोग .....
शानदार सामयिक लेखन
योग शरीर को चुस्त, स्वस्थ रखने का सबसे आसान माध्यम है।
आज के समय में योग की प्रासंगिकता कहीं ज्यादा है । बढ़िया लेख...
सुन्दर आलेख ।
Dynamic
Computer Science Junction
सुंदर लेख.
* नियमित योगाभ्यास से शरीर निरोगी रहता है इसमें कोई दो राय नहीं है. * पर योग पीलिया या दूसरी गंभीर बीमारियाँ ठीक कर देगा इसमें मुझे विश्वास नहीं है. * मुझे नहीं मालुम आप योगाभ्यास करती हैं या नहीं. मैं और मेरी पत्नी १७ सालों से नियमित अभ्यास कर रहे हैं पर यदाकदा डॉक्टर से मुलाकात करनी पड़ जाती है. * योग व्यक्ति विशेष की बनावट, gender और मौसम के अनुसार होना चाहिए. शुरूआती ट्रेनिंग किसी जानकार की देखरेख में होनी चाहिए. भीड़ या बड़े शिविर या टीवी से नहीं सिखा जा सकता है और नुक्सान का अंदेशा है. * योगाभ्यास के साथ साथ खानपान पर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी है.
धन्यवाद.
आज योग की शक्ति को पुरे विश्व ने माना है। इसीलिए विश्वयोग दिवस मनाया जाता है। सुन्दर आलेख।
आपने योग के व्यावहारिक पक्ष का उद्धाटन कर ऋषि ऋण से मुक्त होने का सार्थक प्रयास किया है। चरक संहिता के रचयिता पंतज एक ही व्यक्ति थे में टंकण त्रुटि ज्ञात हो रहा है।
योग के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी......आभार आपका ।
अति सुन्दर ...
योग ही जीवन है ........
योग के बारे में आपका यह आर्टिकल बहुत शानदार लगा।
योग आधुनिक समय के लिए भारत के ऋषि मुनियों की ऐसी देन है जिसको सदियाँ नहीं भुला पाएंगी ... और अब जबकि ये तेजी से विश्व के पटल पर छा रहा है... हर हिन्दुस्तानी के लिए ये गर्व की बात है ... योग के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण और रोचल जानकारी दी है आपने ...
सारगर्भित आलेख
सार्थक, सामयिक आलेख
आवश्यक है योग। सुबह उठकर जिन्हें योग नहीं करना है, वह कुछ एक्सरसाइज ही कर लें तो काम बन जाएगा। पर है तो सब शब्दों का फेर ही। बहुत ही सामयिक और सार्थक लेख की प्रस्तुति।
कविता जी
नमस्कार iBlogger.in TEAM ने आपका चयन बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द मंथ के लिए किया है. कृपया हमें मेल करे..
धन्यवाद
-संस्थापक/संपादक www.iblogger.in
aap bahut achaa likhte ho
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सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!
मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...
उत्तम आलेख ।
सुन्दर आलेख ।
योग के बारे में बहुत अच्छी जानकारी दी आपने कविता जी , आजकल विदेशों में भी योग का व्यापक प्रसार हो रहा है|
योग के बारे में उत्तम जानकारी से भरा ज्ञानवर्धक आलेख ।
जानकारीपूर्ण प्रेरक आलेख।
आपकी बातें ठीक हैं किन्तु योग शारीरिक व्यायाम तथा प्राणायाम से कहीं अधिक है। गीता में अष्टांग योग का उल्लेख है - 1. यम, 2. नियम, 3. आसन, 4. प्राणायाम, 5. प्रत्याहार, 6. धारणा, 7. ध्यान, 8. समाधि। प्रचारतंत्र के माध्यम से योग को जानने वाले यम, नियम, प्रत्याहार तथा धारणा जैसे योग के अविभाज्य अंगों के विषय में ज्ञान नहीं रखते। वास्तविक योग में देह के साथ-साथ मन एवं आत्मा की शुद्धि भी अन्तर्निहित है।
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